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बचपन की कविता २ - यदि होता किन्नर नरेश मैं

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता|
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता||
बंदी जन गुण गाते रहते, दरवाजे पर मेरे |
प्रतिदिन नौबत बजती रहती, संध्या और सवेरे ||

मेरे वन में सिह घूमते, मोर नाचते आँगन |
मेरे बागों में कोयलिया, बरसाती मधु रस-कण ||
यदि होता किन्नर नरेश मैं, शाही वस्त्र पहनकर |
हीरे, पन्ने, मोती माणिक, मणियों से सजधज कर ||

बाँध खडग तलवार सात घोड़ों के रथ पर चढ़ता |
बड़े सवेरे ही किन्नर के राजमार्ग पर चलता ||
राज महल से धीमे धीमे आती देख सवारी |
रूक जाते पथ, दर्शन करने प्रजा उमड़ती सारी ||

जय किन्नर नरेश की जय हो, के नारे लग जाते |
हर्षित होकर मुझ पर सारे, लोग फूल बरसाते ||
सूरज के रथ सा मेरा रथ आगे बढ़ता जाता |
बड़े गर्व से अपना वैभव, निरख-निरख सुख पाता ||

तब लगता मेरी ही हैं ये शीतल मंद हवाऍ |
झरते हुए दूधिया झरने, इठलाती सरिताएँ ||
हिम से ढ़की हुई चाँदी सी, पर्वत की मालाएँ |
फेन रहित सागर, उसकी लहरें करतीं क्रीड़ाएँ ||

दिवस सुनहरे, रात रूपहली ऊषा-साँझ की लाती |
छन-छनकर पत्तों से बुनती हुई चाँदनी जाली ||

                                                                                                                          

                                                                                                                                - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी    

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